मेरा एक छोटा सा किस्सा जो मुझे आज भी याद है

आज मैं आप सबको मेरे बचपन की या यूं कहूं समझदार होने के बाद की एक कहानी सुनाती हूँ शायद में ज्यादा छोटी नहीं थी बड़ी समझदार थी वैसे तो मैं पर मुझे याद नहीं कि मेरी उम्र क्या थी शायद 12,13 या 14 साल थी ।।
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ईद के बाद मेले का टाइम था 2 दिन से मेला चल रहा था मुझे मेले में जाना  था
क्योंकि मुझे गेम लेना था उस गेम को मैंने आसपास के किसी बच्चे के पास देखा तो मैं सिर्फ सोच कर ही इतनी खुश हुए जा रही थी कि मैं भी यह गेम लूंगी मेरे हाथ में भी यह गेम होगा मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था सिर्फ सोच कर ही मैं आपको ऐसे फील करा रही थी कि यह भी मेरे पास भी होगा मेरे हाथ में होगा और मैं उसको खेलूंगी और बहुत खुश हो जाऊंगी>>
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लेकिन मेरे पापा ने बोला मैं नहीं तुम्हें मेले में लेकर जाऊंगा ना ही यह गेम दिलाऊंगा मैंने सब से बोला लेकिन किसी ने मुझे वह गेम दिलाने के लिए हां नहीं भरी ||
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मैंने सोचा मेरे पास जो  ₹300 400 रुपय जमा किए हुए पड़े हैं!!
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मैं उनमें से पैसे देकर ही गेम ले लूंगी तो मेरे पापा को मैंने बोला पैसे मैं खुद दे दूंगी आप मुझे सिर्फ मिले लेकर चलो मैं खुद खरीद लूंगी वह गेम मेरे पापा खेत से आया हुआ अनाज बेचने जिस दिन जा रहे थे उस दिन मैं भी उनके साथ चली गई!!
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उस गेम की कीमत सिर्फ ₹35 थी मुझे आज भी याद है वह गेम वह पैसे वह यादें वह मेरा बचपना और समझदारी और मेरा डरना और मेरा घबराना मुझे सब कुछ याद है!!
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मैं पापा के साथ गई और मैंने वह गेम ₹35 में खरीद लिया और हम लोग घर आ गए घर आ गई मैं लेकिन जो वह गेम लेने से पहले मैंने सोचा जो मुझे खुशी होगी जो मैं उछल कूद करूंगी जो मैं खुद को इतना फील पहले करा रही थी वह घर आने के बाद में सब गायब हो गया!!
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एक अलग सी बेचैनी एक अलग सी घबराहट और एक अलग सी सोच पैदा हो गई दिमाग में कि मेरे पास ₹300 400 रुपय थे अब उनमें से ₹35 कम हो गए मेरे मुश्किल से जमा किए हुए पैसे थे मैं ₹1 भी कभी खर्च  नहीं क्या करती थी कोई भी मुझे 1, 2, 5 ₹10 दे दे तो वह में जमा करती थी उनमें से मेरे ₹35 कम हो गए अब क्या होगा!!
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मैं उस गेम को खेलने का सोचने के बदले उस गेम को किसी को वापस ₹35 में बेचने का सोचने लगी!!
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कहने का मतलब यह है कि मैं कभी अपनी खुशियां खरीद ही नहीं पाई कभी मैं अपनी ख्वाहिश है पूरी नहीं कर पाई जब के मैं पूरी कर सकती थी उसके बाद भी मैं हमेशा कुछ और सोचने लगती थी!!
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आज तो मैं 23 साल की होने आई लेकिन आज भी मैं उसी जाल में फंसी हुई हूं आज भी मैं उसी ही घबराहट में जीती हूं आज भी मुझे कल की फ़िक्र जीने नहीं देती!!
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मुझे नहीं पता कि मैं सही हूं या गलत लेकिन कभी-कभी मुझे खुद पर तरस आता है कि मैं अपनी एक भी ख्वाहिश नहीं तो बचपन में पूरी कर पाई नहीं अभी पूरी कर पाई हूं ना ही मैं आगे पूरी कर पा रही हूं मैंने पैसे जमा भी किए बचपन से लेकर अब तक!!
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लेकिन उन पैसों को आज दिन तक मैं खुद पर खर्च नहीं कर पाई हूं अपनी एक ख़्वाहिश अपना एक सपना तक में पूरा कर नहीं पाई हूं!!
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मुझे नहीं पता कि मेरे किसी गुनाह की यह सजा है या फिर कुछ और लेकिन तरस बहुत आता है खुद पर  मैं खुद के लिए कुछ कर नहीं पा रही हूं जब के मैं कर सकती हूं मुझे नहीं मालूम कि मेरे साथ क्या हो रहा है मैं कल का सोचकर अच्छा कर रही हूं या आज खुद की एक ख्वाहिश भी पूरी ना कर सकती वह गलत कर रही हूं कुछ समझ आता मुझे😊

कल की फ़िक्र कल का सोंच मुझे आज जीने नही द रहा है

क्या मैं कभी इस जाल से निकल पाऊंगी?
क्या मैं कभी इस फिक्र से निकल पाऊंगी ?
क्या मैं कभी भी अपनी खुशी खरीद पाऊंगी? क्या मैं अपना एक भी सपना पूरा कर पाऊंगी?
क्या मैं कभी खुद को समझ पाऊंगी?
क्या मैं कभी कल का सोचना बंद कर पाऊंगी?
क्या मैं कभी आज को जीना सीख पाऊंगी?

इतने सालों से सब सवालः मेरे दिमाग में घूमते जाते हैं और मैं कभी भी खुद को नहीं समझा पाती हूं ना ही मैं इन सब सवालों का जवाब ढूंढ पाती हूँ

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Hi I am Mona Khan. Am a blogger and I write about life,love poetry true story Urdu poems and friendship and also wrote about importance of a girl child in humans life.It was liked by many people.Am looking forward to write more inspirational blogs by which I can give a better shape to the thoughts of our society...
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